Saturday, 16 May 2020

ये शहर लौटकर आना


ये शहर  लौटकर  आना  मुश्किल होगा
इन जख्मों को समझाना मुश्किल होगा

भार  कंधों पर उठा  खफा  दी  जिंदगी 
बेगानापन  यह  भुलाना  मुश्किल होगा 

सोचा न था कोठियां  भरी  थी  जिनकी 
उनको  निवाले  खिलाना मुश्किल होगा

गगन  चुम्मी  इमारतें   हमने  बनाई  थी
पता  न  था सर छुपाना  मुश्किल  होगा

यतीम होकर बच्चे  सड़क पर बिलखते
मां  के  बिन दूध पिलाना मुश्किल होगा 

बड़े    बड़े    वादे  किये  सियासत   तूने
आइना देख  मुंह दिखाना मुश्किल होगा 

बेबसी   बेइंतहां   सड़को  पर  भटकती
जय ये  मंजर  भूल जाना मुश्किल होगा

"जय कुमार" 17/05/20






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