Monday, 13 May 2024

हादसे कुछ इस तरह से होते रहे

हादसे  कुछ  इस तरह से होते रहे 
उनसे  मिलकर  उन्हें हम खोते रहे

मासूम   चेहरा  झुकी   हुई  नजरें 
बंजर ज़मीं  पर  मुहब्बतें बोते रहे

दिल में बसे  दिल की एक न सुनी 
प्यार  की  चाहत  में रोज रोते रहे 

मुकम्मल  मुकद्दर यहां  होता नहीं 
आफताब  दरिया को  सुखोते  रहे 

शरीफ़ों  की बस्ती  में हम जो गये
शराफ़त   से  नाता  हम खोते  रहे 

इस ज़माने का जय तू मुसाफिर है 
सांस ने  साथ छोड़ा  वहीं सोते रहे 

"जय कुमार" (स्वरचित)१३/०५/२०२४
















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