मुसीबत में इतना मचलते क्यों हो
नफरतों में रोज उबलते क्यों हो
तुम अपनी चाल को बदलते क्यों हो
रश्म रिवाज रिवायतें इस ज़माने की
अपने आप को फिर कुचलते क्यों हो
मगरूरियत मैं मशरुफ मुहब्बत कहां
दिल में बसे दिल से निकलते क्यों हो
रक़ीब जब मुहब्बत का मज़हब हुआ
आग के दरिया से जय गुजरते क्यों हो
"जय कुमार " ०३/०५/२४
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