Sunday, 12 May 2024


मेरे   महबूब  तुझे   एक  दिन आना होगा 
आवाज़  देकर फिर  मुझको बुलाना होगा 

सोया  हुआ  हूं  मैं उठता  नहीं  किसी  से 
हाथ  में  हाथ  देकर  मुझे   उठाना  होगा  

चल चुका हूं आगे वक्त ने भी  साथ छोड़ा 
आंखों  से भीगे  दामन को  सुखाना होगा

मेरी  रूह ने  छुआ  जब  रूह को तुम्हारी 
रंजिशो  को  अपनी  तुम्हे   भुलाना  होगा 

तेरी खो  चुकी  हैं  जय  आंखों की रोशनी 
कब्र  पर  आकर  एक  दीप जलाना  होगा 

"जय कुमार "(स्वरचित) १२/०५/२०२४









 






 





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