Friday, 3 January 2014

मैं तेरा ही अक्श था

मैं तेरा ही अक्श था जरा गौर से तो देखा होता।
मैं हर पल साथ था जरा मुड़कर तो देखा होता।

जिस शहर कि राहों में भटके दीवानों कि तरह ,
उस शहर की गलियों में जाकर तो देखा होता।

तू कब मुझसे दूर था हर पल रहा दिल के पास ,
मुझे अपने दिलके करीब रखकर तो देखा होता।

मेरे जज्बात आज तेरे लिये मायने नहीं रखते ,
कभी अपने जज्बातो में ढूंढ़कर तो देखा होता।

असली चेहरा नजर आ जाता अपना तुझको  ,
एक बार मेरी नजरों में झाँककर तो देखा होता।

मुझसे भी तो खता हो गई होगी शायद दोस्त ,
एक बार फिरसे मुझे मौका देकर तो देखा होता।

ख्वाव तो मेने भी खूब देखे थे साथ रहने के तेरे ,
एक बार मेरा भी साथ निभाकर तो देखा होता।

समुन्दर कि लहरे साहिल को छूकर निकल गई ,
कभी साहिल का साथ निभाकर तो देखा होता।

पंछी तो अपना आसियाना फिर खुद बना लेता ,
उड़ने के लिये पंखो को छोड़कर तो देखा होता।

" जय कुमार "

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