Sunday, 2 February 2014

ये कैँसा शहर

ये कैँसा शहर , हर तरफ कहर ही कहर . . .
रोशनी से भरी राहे , अंधेंरे मेँ जीते घर . . .

अँधे फैंशन की चकाचौंद में जीता इंसान ।
इस भागदौड़ में अपने आप से है अंजान ।
मुखोटा झूठ का पहनकर , दिल मेँ है डर . . .

जहरीली हवाओं में यहाँ दम घुटता है ।
आदमी का जीवन हर दिन पिटता है ।
अब खोजलो फिर , अपने गाँव की डगर . . ....

अंधी दौड़ आगें होने को आतुर हर कोई ।
मुख पर मुशकान झूठी लिए हर कोई ।
पड़ोसी को जानते नहीं , ये कैँसी नजर . . .

लूट पाट , मौत का ताँडव होता हर दिन ।
किसी मासूम की लुटती अस्मत हर दिन ।
इंसानियत को भुलाके , दरिंदे घूमते निडर . . .

इमारतों का कद उँचा आदमी का छोटा ।
दौलत की चाहत में हर कोई यहाँ रोता ।
एक इंसान का यहाँ , कैंसे हो अब बसर . . .

"जय कुमार"
30/01/2014

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