गम अब खुशियां मनाने लगे हैं
हंसकर बाते ,,,,,,,,,बनाने लगे हैं
जीवन कटता ,,,,,,रहा बाबरों में
शूल के फूल ,,,,,,खिलाने लगे हैं
नब्ज ए हयात,, रुकी रुकी सी
प्यार के पल याद,,आने लगे हैं
हम हिम्मत लाये सच कहने की
दुश्मनी अपने ,,,,,निभाने लगे हैं
रिबायत नहीं जमाने की हमको
महफिल में हम ,,,दीवाने लगे हैं
मुकद्दर मुकम्मल ,,,,होगा हमारा
गमों से खुशियां ,,,,,चुराने लगे है
"जय कुमार "३१/०३/१६
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