Saturday, 22 July 2017

चल निकल भी जा मानव अँधेरों से ,
उजाले   को   तेरा    ही   इंतजार  है |
नाकामी  की जंजीरों  को  तोड़ अब ,
कामयाबी  को  तुझसे   ही  प्यार  है |
अपने   बनाए   जाल  में  फँसा   रहा ,
दुनिया  के  छोर  दूर  तलक  फैले हैं ,
नाव  को   मोड़  धारा   के   विपरीत ,
तेरी   मंजिल   सितारों   के   पार है |

निगाहों के धोखे से निकल के अब ,
अपने  आप की भी आवाज सुन ले |
जमाने को  जो  कहना  है  कहने दे ,
अपने आपके  एहसासों को चुन ले |
कथनी  करनी  एक नहीं  होती हो ,
कुछ पहचानने की जरूरत लगती ,
तेरे  अंदर  शक्ति   का   समुंदर  है ,
अपनी भूली क्षमताओं को  गुन ले |

भ्रम  कोई  न पाल  अपने  जहन मैं ,
मानव हो तुमे  अमर  पद  पाना  है |
साँसे चलती ये तन  जीवित रहता ,
तब तलक  यही  तेरा  ठिकाना  है |
किसी मकसद से यहाँ आया  है तू ,
उसको  ही  दिलेरी से  निभा  लेना ,
मिला जो  एक  सफर   पूरा  करके ,
फिर  एक  नये  सफर पर  जाना है ||

"जय कुमार"

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