चल निकल भी जा मानव अँधेरों से ,
उजाले को तेरा ही इंतजार है |
नाकामी की जंजीरों को तोड़ अब ,
कामयाबी को तुझसे ही प्यार है |
अपने बनाए जाल में फँसा रहा ,
दुनिया के छोर दूर तलक फैले हैं ,
नाव को मोड़ धारा के विपरीत ,
तेरी मंजिल सितारों के पार है |
निगाहों के धोखे से निकल के अब ,
अपने आप की भी आवाज सुन ले |
जमाने को जो कहना है कहने दे ,
अपने आपके एहसासों को चुन ले |
कथनी करनी एक नहीं होती हो ,
कुछ पहचानने की जरूरत लगती ,
तेरे अंदर शक्ति का समुंदर है ,
अपनी भूली क्षमताओं को गुन ले |
भ्रम कोई न पाल अपने जहन मैं ,
मानव हो तुमे अमर पद पाना है |
साँसे चलती ये तन जीवित रहता ,
तब तलक यही तेरा ठिकाना है |
किसी मकसद से यहाँ आया है तू ,
उसको ही दिलेरी से निभा लेना ,
मिला जो एक सफर पूरा करके ,
फिर एक नये सफर पर जाना है ||
"जय कुमार"
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