Tuesday, 1 May 2018

सरकार

हर  बार धोखे  मिले नाम उसका सरकार  लिखता हूँ
दगे  की  कहानी   छुपाता  नहीं बार  बार  लिखता हूँ

मुहब्बत  देखने  दिखाने  हाथ  से   हाथ  मिलाने  की
जनाब  अंदर  के मनसूबों  की मैं  दरकार  लिखता हूँ

ईमान  की  कसम  खाए बैठे  हैं  मखमली कुर्सी  पर
मुल्क की  बज्‍म  ए  इंसाफ  को बाजार   लिखता  हूँ

मुहब्बत  रात  के आगोश  में  उजाले  में  छोड़  जाते
बहरूपी  इनके  इश्क  के बिगड़े  किरदार लिखता हूँ

जमीन छीन  ना ले  कोई  दिल  की  मैं चौकस  रहता
हर  रोज दिल में उसका नाम  लाखों  बार  लिखता हूँ

उजाड़  गया  हर  मौसम  को  जय  देखते  ही  देखते
बड़ा बेवकूफ़  हूँ   मुहब्बत को  सदाबहार  लिखता  हूँ

"जय कुमार "01.05.2018

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