हर बार धोखे मिले नाम उसका सरकार लिखता हूँ
दगे की कहानी छुपाता नहीं बार बार लिखता हूँ
मुहब्बत देखने दिखाने हाथ से हाथ मिलाने की
जनाब अंदर के मनसूबों की मैं दरकार लिखता हूँ
ईमान की कसम खाए बैठे हैं मखमली कुर्सी पर
मुल्क की बज्म ए इंसाफ को बाजार लिखता हूँ
मुहब्बत रात के आगोश में उजाले में छोड़ जाते
बहरूपी इनके इश्क के बिगड़े किरदार लिखता हूँ
जमीन छीन ना ले कोई दिल की मैं चौकस रहता
हर रोज दिल में उसका नाम लाखों बार लिखता हूँ
उजाड़ गया हर मौसम को जय देखते ही देखते
बड़ा बेवकूफ़ हूँ मुहब्बत को सदाबहार लिखता हूँ
"जय कुमार "01.05.2018
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