Friday, 11 May 2018

गांव  लिखता हूँ शहर  नहीं  जानता
भोर लिखता हूँ  दुपहर नहीं जानता

आग  दिखती  है  पानी  लिए  रहता
कलम पकड़ी है खंजर  नहीं जानता

प्रेम  में   धोखा  आता  नहीं   हमको
रिश्ते निभाता हूँ  जहर  नहीं जानता

चला सख्त राहों पर मंजिल न मिली
राह का राहगीर  सफर  नहीं जानता

मुहब्बत  रोती   रही  आज  चुपचाप
बेदर्द  उसकी  तु  नजर नहीं  जानता

तोड़  दिया दिल  को सीसे  की तरह
आग  लगाता  है असर  नहीं जानता

मतला   मिसरा    मक्ता  आता  नहीं
गजल कैसे  लिखूँ बहर नहीं जानता

"जय कुमार"12/05/18

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