तेरा यह आसियाना है जो
फूलों से घिरा ठिकाना है जो
खूबसूरत जमाने के सपने
फँसा इसमें दीवाना है जो
मिलकियत तेरी बस पानी है
एक दिन तो इसे बह जानी है
सोहरत में डूब गया इतना तू
यह पल दो पल की कहानी है
जाति धर्म के फंदो में फँसा
रंग रूप के कुंदो में फँसा
इस तन की विसात क्या है
चार दिन के चिन्हो में फँसा
रजनी भोर की निशानी है
भोर रजनी की कहानी है
दोपहर के सूरज की रोशनी
संध्या आने पर पुरानी है
"जय कुमार"01-08-14
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