Saturday, 11 March 2017


तेरा   यह  आसियाना  है  जो
फूलों  से घिरा ठिकाना  है जो
खूबसूरत   जमाने   के  सपने
फँसा   इसमें   दीवाना  है  जो

मिलकियत तेरी बस  पानी है
एक दिन तो इसे  बह जानी है
सोहरत में डूब  गया इतना तू
यह पल दो पल की कहानी है

जाति  धर्म  के  फंदो  में  फँसा
रंग   रूप  के   कुंदो   में  फँसा
इस  तन  की  विसात  क्या है
चार  दिन  के  चिन्हो  में फँसा

रजनी  भोर   की   निशानी है
भोर  रजनी   की   कहानी  है
दोपहर  के  सूरज की रोशनी
संध्या   आने   पर    पुरानी है

"जय कुमार"01-08-14

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