शहरों के सन्नाटे से जब , कोई पीर निकलती है |
भाव हिलोरे तब लेते है , मेरी कलम उबलती है ||
आह मुफलिसी की कांनों में , जब उत्पात मचाती है ,
जज्बातों की गहराई से , कोई नज्म निकलती है |
रोशनी में नहाया जब है , शहरों का कोना कोना
जहीं उजाला नहीं पुहुँचता ,वहां मुफलिसी पलती है |
कारोबार के कौशलों से ,विकसित हुआ समाज है ,
उँची इमारत के साये में , बैठी भूख मचलती है |
यारी हुई थी कल भूख की , राह पड़े कुछ टुकड़ो से ,
यार आज वेवफा हुआ है , यारी रोज न चलती है ||
"जय कुमार"18|10|16
No comments:
Post a Comment