Tuesday, 18 October 2016

शहरों  के  सन्नाटे  से जब , कोई  पीर  निकलती है |
भाव  हिलोरे  तब  लेते है , मेरी  कलम  उबलती  है ||

आह मुफलिसी की कांनों में , जब उत्पात मचाती है ,
जज्बातों  की  गहराई  से , कोई नज्म  निकलती है |

रोशनी में  नहाया जब है  , शहरों  का  कोना  कोना
जहीं उजाला नहीं पुहुँचता ,वहां मुफलिसी पलती है |

कारोबार  के कौशलों से ,विकसित  हुआ समाज है ,
उँची  इमारत  के  साये  में ,  बैठी  भूख  मचलती है |

यारी हुई थी कल भूख की , राह पड़े कुछ टुकड़ो से ,
यार  आज वेवफा  हुआ  है , यारी रोज  न  चलती है ||

"जय कुमार"18|10|16

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