बीते हुए लम्हों की याद सताती रही |
गांव की वो गलियां रोज बुलाती रही ||
शहर में वेहयाई कि इंतिहां से मिले ,
पनघट की हमको गोरी रिझाती रही |
बूढे बरगद की छाया से ठंडक मिले ,
वो बापू की लकड़ी याद दिलाती रही |
ख्वाबों के शहरों से हम आकर मिले ,
मिट्टी के रिश्तों की बात जाती रही |
तंग गलियां संग दिल लोगों कि दुनिया ,
संस्कारों को जय दीमक सी खाती रही ||
"जय कुमार"२०/१०/१६
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