Wednesday, 19 October 2016

बीते  हुए  लम्हों की  याद  सताती रही |
गांव की वो  गलियां  रोज  बुलाती रही ||

शहर में  वेहयाई  कि  इंतिहां  से  मिले ,
पनघट  की हमको  गोरी रिझाती रही |

बूढे  बरगद  की छाया  से  ठंडक  मिले ,
वो  बापू की लकड़ी याद  दिलाती रही |

ख्वाबों  के शहरों से  हम आकर  मिले ,
मिट्टी के  रिश्तों की  बात  जाती रही |

तंग गलियां संग दिल लोगों कि दुनिया ,
संस्कारों को जय दीमक सी खाती रही ||

"जय कुमार"२०/१०/१६



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