Saturday, 29 April 2017

रोज  नये  नये  सवाल  होते  रहे |
यूँ ही हर दिन  बवाल  होते   रहे ||

दौलत के अमीर  शहरों  के इंसां ,
जज्वात ए दिल कंगाल  होते रहे |

करते  रहे दुआ हम  खैरियत कि ,
हमारे  जज्वात  हलाल  होते रहे |

दुश्मन  तो  तरस खा छोड़ते गये ,
अपने बन दोस्त दलाल होत रहे |

नेक प्रयास करते थे सुलझने का ,
शक  के अजीब जंजाल होते रहे |

"जय कुमार"

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