रोज नये नये सवाल होते रहे |
यूँ ही हर दिन बवाल होते रहे ||
दौलत के अमीर शहरों के इंसां ,
जज्वात ए दिल कंगाल होते रहे |
करते रहे दुआ हम खैरियत कि ,
हमारे जज्वात हलाल होते रहे |
दुश्मन तो तरस खा छोड़ते गये ,
अपने बन दोस्त दलाल होत रहे |
नेक प्रयास करते थे सुलझने का ,
शक के अजीब जंजाल होते रहे |
"जय कुमार"
No comments:
Post a Comment