Monday, 24 April 2017

अपने  वादों से  मुकरता  है कोई|
टूटे आईने सा  बिखरता है कोई |
उजाले के लिए  ही रोज  आग से ,
कहां चिरागों सा गुजरता है कोई ||

"जय कुमार"

No comments:

Post a Comment