आग भड़क उठी अंगारे बिखर रहे ।
पानी नसीब नहीं प्यासे अधर रहे ।
लुट रहा हो काफिला जज्वातों का ,
अँधेरी रात लुटेरों पर नजर रहे ।
उम्र बीत चुकी राह देखते रहे ,
राह के राहगीर बता किधर रहे ।
माल मोतिओं की टूट रही फिरसे ,
रेशमी धागों के कहाँ बसर रहे ।
लूट कि रूह तक मुहब्बत में उसने ,
कट रही हो जड़े कैसे सबर रहे ।
जमाने से मिलते रहे है हम रोज ,
अपने आपसे मिले तब खबर रहे ।
नये जमाने नये खून कि ये दास्ताँ ,
बुजुर्गो के कहाँ अब जय असर रहे ।।
"जय कुमार"
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