Tuesday, 27 September 2016

उन परिंद्रो को दर्द ए गम की फिक्र कहां  ,
इश्क ए दरिया में जिंदगी बसर करते है ।

उन  दरख्तों को  हवायें नही डरा  पाती,
सीने  में  जिनके बबंड़र सफर करते है ।

रोज मिलते है  जमाने  की राहों में लोग ,
भूलते नही जो दिल  पर असर करते है ।

पुष्प खिलते है बागों में हर दिन ही नये ,
महकते वो  जो काँटों में बसर  करते है ।

एक रोज पत्थर भी पिगल जाता मगर ,
हम अपने  जज्वातों में  कसर  करते है ।

बेपनाह मुहब्बत के जज्वात वयां नहीं ,
चाह में उसकी जय रूह नजर करते है ।

"जय कुमार"

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