दर्द कौन समझता है एक बेरोजगार का ।
रोज बाजार सजता है..बस भ्रष्टाचार का ।
घोड़ों को दोड़ने का...मौका कहाँ मिलता ,
लोगो को इंतजार है गधों के व्यवहार का।।
रोज बाजार सजता है..बस भ्रष्टाचार का ।
घोड़ों को दोड़ने का...मौका कहाँ मिलता ,
लोगो को इंतजार है गधों के व्यवहार का।।
"जय कुमार"
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