Saturday, 26 August 2017

एक प्रयास _/\_  . .

गीत  गजलों  की  भाषा हूँ ।
दर्द  मजलूम  का  गाता  हूँ ।

आँसू सूख गये  आंखों  से ,
उनका मैं  मर्ज  सुनाता  हूँ ।

बिछोना  है धरती जिनकी ,
उनके  मैं    बीच   पाता  हूँ ।

गीत  शहनाई  के न  आते ,
मजबूरी मन की सुनाता हूँ ।

घोर निराशा  के  अंधेरों में ,
एक आशा दीप जलाता हूँ ।

जिन्हे  जमाने ने धुतकारा ,
मैं  उनको  गले  लगाता हूँ ।

वतन पर जो  जान  लुटायें ,
मैं उनको शीश झुकाता हूँ ।

कदम मिलाकर ही चलने में ,
मैं  जय  विश्वास  जताता हूँ।

"जय कुमार"

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