Tuesday, 1 August 2017

एक प्रयास _/\_ . . . . .

यह  तेरा  आसियाना   है  जो
फूलों से घिरा ठिकाना  है  जो
खूबसूरत   जमाने   के  सपने
फँसा   इसमें   दीवाना  है  जो

मिलकियत  तेरी बस पानी है
एक दिन  तो इसे बह जानी है
शोहरत  में  डूबा है  तू  इतना
यह पल दो पल की कहानी है

जाति  धर्म  के  फंदो  में  फँसा
रंग  रुप के  इन कुंदो में फँसा
इस  तन  की  विसात क्या  है
चार  दिन  के चिन्हो  में  फँसा

रजनी  भोर   की   निशानी  है
भोर   रजनी  की    कहानी  है
दोपहर  के   सूर्य  की  रोशनी
साँझ    आने   पर    पुरानी  है

"जय कुमार"01-08-14

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