खुशी इक से नहीं मिली , गम हजारों का झेला है
साथ देता रहा सबका , सफर मेरा ही अकेला है
टूटे वादों कि कहानी , कही न जाती अब मुझसे
मुहब्बत रोज रोती है , जज्वातों का झमेला है
सूख जाते है आंसू भी, तपन जब प्यार की तपती
याद उसकी सताती है , धूप चांदनी सी लगती
मीठी आवाजे अब भी , हवा कानों तक लाती है
हाथ मिलकर चले गये , वक्त ने खेल खेला है
लहरों की इक ख्वाहिश, बस साहिल से मिलना है
कलियों की इक ख्वाहिश , फूलों सा खिलना है
लहरे दम तोड देती , फूल खिलकर टूटते है
तमाशा रोज होता है , यह जमाने का मेला है
"जय कुमार "
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