Friday, 11 August 2017

दिल्ली के दरबारों  का सच क्यों कोई  लिखता  नहीं
सत्तर  बर्ष   के  बूढे   सपने  सत्य  तुमे  दिखता  नहीं 
वादे  और   इरादे  इनके  लगते  नदी  के  दो साहिल
पैकिंग  चाहे सुंदर  करलो  सदियों  झूठ छिपता नहीं

"जय कुमार "

No comments:

Post a Comment