कदम पीछे हटाना अब नहीं
चल चुका हूं बहाना अब नहीं
मंजिल इंतजार करती हो जब
दूरी से घबराना अब नहीं
नर्म राह कि चाहत से निकल
आलस्य को बुलाना अब नहीं
सपने नहीं हकीकत है यही
काम से दिल चुराना अब नहीं
कल क्या हुआ कल क्या होगा
इस आज को भुलाना अब नहीं
वक्त ने खेल खेला रुलाने का
किसी और को रुलाना अब नहीं
हाथ नहीं जब दिल मिलते थे
वह गुजरा जमाना अब नहीं
जिस्म कि चाहत रही प्रेम कहां
इनसे दिल लगाना अब नहीं
गुजरा जय आग के दरिया से
मुहब्बत का फंसाना अब नहीं
"जय कुमार "२१/०९/१७
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