Sunday, 13 August 2017

कदम    पीछे   हटाना  अब   नहीं
चल  चुका  हूं  बहाना  अब   नहीं

मंजिल   इंतजार  करती  हो  जब
दूरी   से     घबराना    अब    नहीं

नर्म  राह  कि  चाहत  से   निकल
आलस्य  को  बुलाना  अब   नहीं

सपने   नहीं   हकीकत   है    यही
काम  से  दिल  चुराना  अब  नहीं

कल क्या  हुआ  कल  क्या  होगा
इस आज  को भुलाना  अब  नहीं

वक्त ने  खेल   खेला  रुलाने   का
किसी और  को रुलाना अब नहीं

हाथ  नहीं  जब  दिल  मिलते   थे
वह   गुजरा   जमाना   अब   नहीं

जिस्म  कि  चाहत रही प्रेम  कहां
इनसे   दिल   लगाना  अब   नहीं

गुजरा  जय  आग  के  दरिया   से
मुहब्बत  का  फंसाना   अब  नहीं

"जय कुमार "२१/०९/१७

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