असली सूरत छुपाते रहे ।
बनावटी रुप दिखाते रहे ।
घर रोशन करने के लिए ,
सबके घौंसले जलाते रहे ।
किसी को देखा उजाले में ,
जले दीप क्यों बुझाते रहे ।
खिलखिलाते पंछियों को ,
रंज व गम से मिलाते रहे ।
गहरी नींद सो गया कल मैं ,
सफर के साथी बुलाते रहे ।
जय बैचेनी में मिला क्या ,
रोज ही अश्क बहाते रहे ।
"जय कुमार"
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