Sunday, 6 August 2017

असली   सूरत  छुपाते  रहे ।
बनावटी रुप    दिखाते  रहे ।

घर  रोशन  करने  के   लिए ,
सबके  घौंसले  जलाते  रहे ।

किसी  को  देखा  उजाले में ,
जले  दीप  क्यों  बुझाते रहे ।

खिलखिलाते   पंछियों   को ,
रंज  व  गम से  मिलाते  रहे ।

गहरी नींद सो  गया  कल मैं ,
सफर  के साथी  बुलाते रहे ।

जय  बैचेनी  में   मिला  क्या ,
रोज  ही  अश्क  बहाते  रहे ।

"जय कुमार"

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