Wednesday, 4 December 2013

मेला लगो

अबे कछु नई बिगड़ो अबे सबई सम्हल जाए रे ।
काय फसोँ आफत मेँ तै राम राम काये ने गाए रे ।

रातई दिन ते माया जोड़े कर कर उलटे काम ,
तोरो जो महर अटरिया कोनऊ संगे ने जाए रे ।

कछु करम तो अब तै नोने करले मूरख मानस ,
जो लोक सुधर जेहे भैया वो भी सुधर जाए रे ।

कोनऊ की काये ते सुन रओ अपने मन की सुन ,
जो जंजाल तो चलो आरओ काये देखन जाए रे ।

मेला लगो सदियोँ से पंछी को ऐसई पसायेँ ,
अब राम सहारो लेईके पिँजरा से उड़ो जाए रे ।

"जय कुमार" 03/12/2013

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