चल चुका हूँ लौटना नहीँ चाहता ।
टूट चुका हूँ विखरना नही चाहता ।
तेरे दम पर जी रहा हूँ ये जिँदगी ,
उठ चुका हूँ बैठना नहीँ चाहता ।
अंधेरी राह मेँ उजालोँ की तलाश ,
चल चुका हूँ लौटना नहीँ चाहता ।
कौन कहता की तलाश जारी नहीँ ,
ढूड़ना जारी पर बताना नहीँ चाहता ।
कल की बात है जब वो मेरे साथ था ,
बिछड़ चुका अब मिलना नहीँ चाहता ।
जिसकी तलाश मेँ जिँदगी खोई है ,
वो अब मुड़कर देखना नहीँ चाहता ।
कई हकदार है इस जिँदगी के यार ,
हिस्से हो चुके हैँ बँटना नहीँ चाहता ।
"जय कुमार" १८/१२/२०१३
टूट चुका हूँ विखरना नही चाहता ।
तेरे दम पर जी रहा हूँ ये जिँदगी ,
उठ चुका हूँ बैठना नहीँ चाहता ।
अंधेरी राह मेँ उजालोँ की तलाश ,
चल चुका हूँ लौटना नहीँ चाहता ।
कौन कहता की तलाश जारी नहीँ ,
ढूड़ना जारी पर बताना नहीँ चाहता ।
कल की बात है जब वो मेरे साथ था ,
बिछड़ चुका अब मिलना नहीँ चाहता ।
जिसकी तलाश मेँ जिँदगी खोई है ,
वो अब मुड़कर देखना नहीँ चाहता ।
कई हकदार है इस जिँदगी के यार ,
हिस्से हो चुके हैँ बँटना नहीँ चाहता ।
"जय कुमार" १८/१२/२०१३
No comments:
Post a Comment