जख्म को खुरेच कर क्या देखते हो दोस्त ,
तुने मेरे दिल को खुरेच कर तो देखा होता ।
जख्म पर जख्म देना तो कोई तुमसे सीखे ,
दर्द की परतो को कुरेदकर तो देखा होता ।
टूटकर चाहा दीवाना कहा जमाने ने मुझको ,
एक नजर दिल मेँ झाँक कर तो देखा होता ।
मैँ भटकता रहा जिन राहोँ पर उम्र भर ,
मेरे दर्द को राहोँ से पूँछकर तो देखा होता ।
मँजिल ना मिलती कोई गम ना था हमको ,
पर सही राहोँ पर चलकर तो देखा होता ।
मेरे जज्बात को भूल गया तू कोई बात नहीँ ,
अपने दिल के स्पंदन को छूकर तो देखा होता ।
कब तक साथ निभाया यहाँ वादो ने दोस्तो ,
एक बार रुह से प्यार कर तो देखा होता ।
"जय कुमार" १५/१२/२०१३
तुने मेरे दिल को खुरेच कर तो देखा होता ।
जख्म पर जख्म देना तो कोई तुमसे सीखे ,
दर्द की परतो को कुरेदकर तो देखा होता ।
टूटकर चाहा दीवाना कहा जमाने ने मुझको ,
एक नजर दिल मेँ झाँक कर तो देखा होता ।
मैँ भटकता रहा जिन राहोँ पर उम्र भर ,
मेरे दर्द को राहोँ से पूँछकर तो देखा होता ।
मँजिल ना मिलती कोई गम ना था हमको ,
पर सही राहोँ पर चलकर तो देखा होता ।
मेरे जज्बात को भूल गया तू कोई बात नहीँ ,
अपने दिल के स्पंदन को छूकर तो देखा होता ।
कब तक साथ निभाया यहाँ वादो ने दोस्तो ,
एक बार रुह से प्यार कर तो देखा होता ।
"जय कुमार" १५/१२/२०१३
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