Monday, 23 December 2013

साँझ ना देखी जिसने

साँझ ना देखी जिसने , 
वो भोर को क्या जाने . . . 
पतझड़ ना देखा जिसने , 
वो बसंत को क्या माने . . .

सुख दुख की छाँव धूप , 
रात दिन का जोड़ा खूब , 
श्याम श्वेत के रंग निराले , 
जो जीवन के रंग ना जाने , 
वो जीवन को क्या माने . . .

अंधेरो की राह जब तक , 
रोशनी की महफिल तब तक , 
कुछ अच्छा कुछ बुरा यहाँ , 
जो असत्य को ना पहचाने, 
वो सत्य को कैसे माने . . .

ऊपर नीचे धरती आकाश , 
आंगे पीछे और दूर पास , 
ज्ञान अज्ञान साथ रहते , 
अपनी अपनी भाषा कहते , 
जिसे निशा का आभाष नहीँ , 
वह दिन को क्या माने . . .


"जय "

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