Tuesday, 9 September 2014

खुदको मिटाकर

खुदको मिटाकर क्या मिला ?
जीवन घटाकर क्या मिला ?
क्यों रंज पालते फिजूल के ,
यूँ दर्द बड़ाकर क्या मिला ? ?

कभी जमाने से मिल लेते ।
किसी बगिया में खिल लेते ।
किस राह पर चले हो यार .
राह ए मुहब्बत पे चल लेते । ।

यूँ उदास होकर क्या मिला ?
बदहबास होकर क्या मिला ?
होश में अपने आप से मिलते ,
यूँ निराश होकर क्या मिला ??

दिल के नजारे से मिल लेते ।
अपने ही उजारे से मिल लेते ।
खास बनाया था रब ने तुम्हे ,
जीवन किनारे से मिल लेते ।।

जिंदगी जलाकर क्या मिला ?
बंदगी भुलाकर क्या मिला ?
कुछ खास करना था मानव ,
मनुष्यता जलाकर क्या मिला ??

चलो फिर आगाज करते है ।
अपने आप से बात करते है ।
क्या जिया है क्या जीना था ,
जिंदगी का हिसाब करते है ।।

"जय कुमार"03/09/14

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