Tuesday, 2 September 2014

काये भैया

काये भैया तुम काये रो रये
अँधियारी रात में जमाने सो रये
मीठी बाते सुनके तबियत तबेला
मन बौगना हो रये . . . . . .

आदमन की गिनती बढ़तई जा रई
कलुआ की कमाई बच्चन में जा रई
देखो तो कक्का जे का दिन आ गये
सो कक्का ऐसे हम रो रये . . . .

भगुआ के बब्बा की थी पचास बीगा जमीन
ओके नतियाँ अब पाँच पाँच बीगा पा रये
सो दाऊ हम ऐसे रो रये . . . . .

मोरे दद्दा ने कई ती लेलो बेटा ज्ञान
नईं पड़ो हमने सो रोजई जा रई जान
बड़े दद्दा के खेतन में , बेजई भिट्या रये . .
सो कक्का ऐसे रो रये . . . .

बड़े शहर खो गये ते नौकरी करन खो ।
बेगारी ऐसी उते के हजारों बेहा रये . .
सो भैया ऐसे रो रये . . . .

रेलन की भीड़ देख निकर रये प्रान ।
आदमन के बीच में हम हिरा हिरा जा रये . .
सो कक्का ऐसे रो रये . . .

पेंले गाँव घर बड़े दूर दूर होत थे
जमीन घट गई घर डिगों डिगों आ गये
दाऊ के समय में बैलगाड़ी चलत थी
ये जमाने में फटफटियन की लेन लगा रये . .
सो बड़े दद्दा ऐसे रो रये . . . .

रजुआ के एक मोड़ा मोड़ी सो खूबई पड़ा रयो
मोरे के आठ जनै भैया खावे नईं पुजा पा रये . . . .
सो राजा ऐसे रो रये . .

ओकी एक मोड़ी पड़ी लिखी
सो नौने घर में ब्याह रई
मोरे के चार चार विन्ना हरे भैया
सो जे ससरार वारे लाखन मगा रये . . .
सो राम धई ऐसे रो रये . . . .

'जय' तुम हिंदी नई जानत
सो बुन्देली में समझा रये . .

काये भैया तुम काये रो रये
अँधियारी रात में जमाने सो रये
मीठी बातें सुनके तबियत तबेला
मन बौगना हो रये . . . .

"जय कुमार"

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