Sunday, 28 September 2014

उन परिंद्रो को


उन परिंद्रो को दर्द ए गम की फिक्र ना ,
इश्क ए दरिया में जो बसर करते है ।
उन दरख्तों को हवाओं का डर कैंसा ,
सीने में जिनके बबंड़र सफर करते है ।
रोज मिलते जमाने की राहों में लोग ,
भूलते ना जो दिल पर असर करते है ।
पुष्प खिलते बागों में हर दिन नये है ,
महकते वो जो काँटों में बसर करते है ।
किसी रोज पत्थर भी पिगल जाता ,
हम अपनी भावना में कसर करते है ।
बेपनाह मुहब्बत के जज्वात वयां नहीं ,
चाह में उसकी जय रुह नजर करते है ।
"जय कुमार" 27/09/14

No comments:

Post a Comment