Tuesday, 9 September 2014

जब दर्द गुजरता

जब दर्द गुजरता हो राहों में ।
कैंसे खुशी मनाऊँ बाँहों में ।।

घर के दीपक कैंसे उजारु ,
तम छाया हो गलियारों में ।

खुशबु के बाग मंजूर नहीं ,
जब घुला जहर दिशाओं में ।

उनके खून पसीने को भूले ,
जिनका जीवन है खारों में ।

कैसे निवाला गले से उतरे ,
याद करे जब कोई आहों में ।

वतन के मतवारो को भूले ,
चस्पा दिया अब दीवारोँ में ।

मंदिर मस्जिद में कैसे जाऊँ ,
लिप्त रहा जय जो गुनाहों में ।

"जय कुमार"07/09/14

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