पानी की चाह से नदिया खुद रास्ता बनाती है ।
नियमों से अपने प्रकृति खुद संतुलन बैठाती है ।
दिल भर जाते तन मर जाते प्रेम रुहानी हो तो ,
कायनात खुद अर्श से फर्स पर राह दिखाती है ।।
नियमों से अपने प्रकृति खुद संतुलन बैठाती है ।
दिल भर जाते तन मर जाते प्रेम रुहानी हो तो ,
कायनात खुद अर्श से फर्स पर राह दिखाती है ।।
"जय कुमार"23/09/15
No comments:
Post a Comment