Tuesday, 20 October 2015

अड़ खड़े

अड़ खड़े ,, ऐँठे रहे ।
छिप यहाँ कैसे रहे ।
कहर की वो रात थी ,
बुत बने ,,, बैठे रहे ।
शहर की हरेक गली ,
छिप गई ,, ऐसे रहे ।
दर बदर होकर गये ,
कल चले , जैसे रहे ।
समय के हर पहर में ,
जय लुटे ,, वैसे रहे ।।
"जय कुमार"

No comments:

Post a Comment