Tuesday, 20 October 2015

मौसम आँगन

मौसम आँगन में सजते रहे ।
दीमक दामन में लगते रहे ।।
शहनाई की आवाजें गुमी ,
आबरू के वस्त्र जलते रहे ।
कफन जनाजा ढूंढ़ता रहा ,
जिस्म भेड़िया निगलते रहे ।
कत्ल रूह का होता रोज ही ,
गुमनामी के गीत बजते रहे ।
नीली नीली आँखों के ख्वाब ,
भरे बाजार में मचलते रहे ।
जीत की उम्मीद में रोज ही ,
जय हार दहलीज चढ़ते रहे ।।
"जय कुमार"24/09/15

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