Sunday, 25 October 2015

इंसानियत

इंसानियत से गिरे हुए ।
तिजोरी अपनी भरे हुए ।
झूठ मालामाल हुआ अब ,
सत्य के कपड़े फटे हुए ।
छिलके सन्तरे के पहने ,
अन्दर से जो .. कटे हुए ।
बनते रहते जेन्टल मेन ,
भीतर से जो . लुटे हुए ।
कंगारू पत्थर . चमकते ,
नींव के पत्थर हिले हुए।
हाथ मिलाते हमदर्दी से ,
दिल में गहरे गिले हुए ।।
"जय कुमार"24/10/15

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