Thursday, 29 October 2015

जब से सगे

जबसे सगे ही ,,,,,,,,कटने लगे हैं !
जमाने हम पर ,,,,,,,हँसने लगे है !!

किसको रही परवाह रिश्तों की ,
रिश्तों में व्यापर ,,चलने लगे है !

बैठा बूढ़ा बरगद ,,,गुमसुम अब ,
 घास की इज्जत ,,करने लगे है !

वजूद जिससे बोझ ,लगने लगा ,
टहनी को तना ,,,,,खलने लगे है !

प्रबन्ध का होता ,,, अनुबन्ध जी ,
सबंध जब से,,,, बिखरने लगे है !

मायूसी के मौसम ,,,,,सजते चले ,
उम्रदराज घर से ,,,,डरने लगे है !

चन्द पैसों की भूख ,,,,जाती नहीं ,
स्वारथ से साथी , मिलने लगे है !

वासनाओं में दौडा ,,,,,जय अंधा ,
मरम प्यार के ,,,,,,बदलने लगे है !!

"जय कुमार"28/10/15

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