अपनी माँ के पैर,,, सहला न पाया !
लख्ते जिगर कभी कहला न पाया !!
लख्ते जिगर कभी कहला न पाया !!
दूध पिलाया था ,,,,,,,,अपने खून से ,
उसे दो बूँद पानी ,,,,,पिला न पाया !
गंदगी पर लेट छाती से लगा रखा ,
सुकून से दो पल उसे सुला न पाया !
सुकून से दो पल उसे सुला न पाया !
तरसती रही वो ,,,,,,दो निवालों को ,
डर बीबी का जुबाँ ,,,,हिला न पाया !
खाँसने की रोज ,,,,,,आवाज सुनता ,
बाजार से मैं दवा ,,,,,,,,,,ला न पाया !
तड़पती रही टूटी ,,,,,,,,खाट पर माँ ,
फिर भी मैं ,,,,,,,,तिलमिला न पाया !
दुआ देती रही ,,,,,,,बेसुद बिस्तर में ,
दो पल उसके करीब ,,जा न पाया !
चली गई दुनिया को ,,,छोड़कर माँ ,
ममता भरी आँखे,,,, भुला न पाया !
हरेक बरष तरपण,,, करता माँ का ,
तस्वीर से नजरे,,,, ,मिला न पाया !
सजा का हकदार ,,,,हूँ मेरे भगवन ,
जय बेटे का फर्ज ,,,,निभा न पाया !!
"जय कुमार"13/10/15
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