Tuesday, 20 October 2015

अपनी माँ

अपनी माँ के पैर,,, सहला न पाया !
लख्ते जिगर कभी कहला न पाया !!

दूध पिलाया था ,,,,,,,,अपने खून से ,
उसे दो बूँद पानी ,,,,,पिला न पाया !

गंदगी पर लेट छाती से लगा रखा ,
सुकून से दो पल उसे सुला न पाया !

तरसती रही वो ,,,,,,दो निवालों को ,
डर बीबी का जुबाँ ,,,,हिला न पाया !

खाँसने की रोज ,,,,,,आवाज सुनता ,
बाजार से मैं दवा ,,,,,,,,,,ला न पाया !

तड़पती रही टूटी ,,,,,,,,खाट पर माँ ,
फिर भी मैं ,,,,,,,,तिलमिला न पाया !

दुआ देती रही ,,,,,,,बेसुद बिस्तर में ,
दो पल उसके करीब ,,जा न पाया !

चली गई दुनिया को ,,,छोड़कर माँ ,
ममता भरी आँखे,,,, भुला न पाया !

हरेक बरष तरपण,,, करता माँ का ,
तस्वीर से नजरे,,,, ,मिला न पाया !

सजा का हकदार ,,,,हूँ मेरे भगवन ,
जय बेटे का फर्ज ,,,,निभा न पाया !!

"जय कुमार"13/10/15

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