कदमों की आहट से जो
पहचान लिया करते थे
वो सामने आकर भी
अनजान बनते हैं
कभी साथ रहने के बहाने
ढूड़ा करते थे जो
वो साथ खड़े होकर भी
बेजान बनते हैं
पिछली रुत जो साथ
रहे मेरे हमदम बनके
पत्थर ही उनकी अब
एक पहचान बनते हैं
मंजर ना बदले कुदरत
एक सा सलीखा उसका
रंग तो बदलते जमाने में
जो इंसान बनते हैं
"जय कुमार"17/07/14
पहचान लिया करते थे
वो सामने आकर भी
अनजान बनते हैं
कभी साथ रहने के बहाने
ढूड़ा करते थे जो
वो साथ खड़े होकर भी
बेजान बनते हैं
पिछली रुत जो साथ
रहे मेरे हमदम बनके
पत्थर ही उनकी अब
एक पहचान बनते हैं
मंजर ना बदले कुदरत
एक सा सलीखा उसका
रंग तो बदलते जमाने में
जो इंसान बनते हैं
"जय कुमार"17/07/14
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