Friday, 25 July 2014

हिफाजत के

हिफाजत के दानवो से देश
हैरान हो गया ।
देखके दरिन्द्रगी जिंदा भी
मौन हो गया ।
रहम की भीख माँगता रहा
हाथ फैलाए ,
राम रहीम गंगा का वतन
वीरान हो गया ।

कदमों के निशान परछाई
मिटाने लगी है ।
अक्स को अंधेरे की साजिश
घेरने लगी है ।
मौका परस्ती मौके में बैठा
वो सियार अब ,
वजूद को मिटाने मीठा विष
घोलने लगी है ।

गैरत के पत्थरो से घायल
मकान हो गया ।
इंसान क्या इंसानियत से
अनजान हो गया ।
उठकर चलता चलकर रुकता
कुछ ना कहता ,
लगता वो बूढ़ा शहर अब
बेजान हो गया ।

"जय कुमार"24/07/14

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