Saturday, 19 July 2014

"हाइकू"

\जल झड़ी में
भीगे मोरो अंग रे
आया साँवन

ताल तलैया
सरिता कल कल
करती गान

संगीत सुना
प्रकृति मनमोहे
साँवन संग

हरियाली ने
धरा पर ज्यों पैर
पसारे दूर

वन श्रँगार
कर प्रफुल्लित हो
मोर के संग

हरी चुनरी
ओढ़िके होती धरा
हरि तुल्य रे

मन ललचा
विरहन का अब
प्रीतम आस

कारे बदरा
कारी रातें करती
मन उदास

"जय कुमार"18/07/14

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