जीवन नाव
डगमग होती है
धैर्य का माँझी
सूरज तेज
झुलजता ना पौधा
पत्ती रक्षक
प्रकृति देती
व्यवस्था जीव करे
अपनी रक्षा
सूर्य उगना
उगकर ढलना
चक्र नियत
समय चाल
जीवों का बड़ा होना
मृत्यु को पाना
नियत वक्त
रुके ना थके ना जो
कुदरत का
पुष्प खिलता
मुरझाता गिरता
बिखर जाता
प्रकृति नया
खिलाती पुष्प फिर
क्रम चलता
आज का कल
कल होगा फिर से
कल जो आज
"जय कुमार" 7 /08/14
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