Friday, 8 August 2014

कोलाहल में

   "हाइकू"     

कोलाहल में 
आवाज दब गई 
मासूम की थी 

धन की आड़ 
चलता है चाबुक
निर्बल खाल

मुफलिसी में
याद नहीं फसाने
याद है रोटी

चले जो सीधा
उल्टा कहे दुनिया
आज की रीत

ईमान दीप
निकला जो मन से
पुँहुचा हाट

कोई डगर
मिलती ना मंजिल
होती अपूर्ण

काल के जाल
हर तरफ होते
बचना कर्म

"जय कुमार"5/08/14

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