
गीत गजलों की भाषा हूँ ।
सोते इंसान को जगाता हूँ ।
आँखों से आँसु सूख गये ,
उनके दर्द को सुनाता हुँ ।
उनके दर्द को सुनाता हुँ ।
धरती है जिनका बिछोना ,
बीच उनके खुदको पाता हूँ ।
बीच उनके खुदको पाता हूँ ।
शहनाई गीत ना भाते मुझे ,
मजबूरी मन की सुनाता हूँ ।
मजबूरी मन की सुनाता हूँ ।
घोर निराशा के अंधेरों में ,
एक आशा दीप जलाता हूँ ।
एक आशा दीप जलाता हूँ ।
जिनको धुतकारा जमाने ने ,
मैं उनको भी गले लगाता हूँ ।
मैं उनको भी गले लगाता हूँ ।
जो वतन पर जान लुटाये ,
उनको मैं शीश झुकाता हूँ ।
उनको मैं शीश झुकाता हूँ ।
कदम मिलाकर चलने में ही ,
मैं जय विश्वास जताता हू ।
मैं जय विश्वास जताता हू ।
"जय कुमार"27/08/14
No comments:
Post a Comment