बज गई अब बीन चुनावों की ,
वो बिलों से बाहर फिर आने लगे ।
अपना असली चेहरा जो छुपाये ,
देश राग वो सब अब गाने लगे ।
कीड़ो से बत्तर समझते रहे जो ,
वो रंगीन सपने अब दिखाने लगे ।
सालो जिनको रुलाया था जिनने ,
वो सपेद पोस अब मनाने लगे ।
चार दीवारो मेँ जो बंद थे कभी ,
उनको फिर वो अब जगाने लगे ।
हीरे को मौका कहाँ मिलता अब ,
वो फिर खोटे सिक्के चलाने लगे ।
किया कुछ ना दिखा उनका तब ,
वो वादों से फिर बहलाने लगे ।
लोकतंत्र के भाग्य तो देखो मित्रो ,
संसद में गुंडे नजर अब आने लगे ।
सियासत का खेल भी बड़ा निराला ,
अब दुश्मन भी हाथ मिलाने लगे ।
"जय कुमार" 17/03/14
वो बिलों से बाहर फिर आने लगे ।
अपना असली चेहरा जो छुपाये ,
देश राग वो सब अब गाने लगे ।
कीड़ो से बत्तर समझते रहे जो ,
वो रंगीन सपने अब दिखाने लगे ।
सालो जिनको रुलाया था जिनने ,
वो सपेद पोस अब मनाने लगे ।
चार दीवारो मेँ जो बंद थे कभी ,
उनको फिर वो अब जगाने लगे ।
हीरे को मौका कहाँ मिलता अब ,
वो फिर खोटे सिक्के चलाने लगे ।
किया कुछ ना दिखा उनका तब ,
वो वादों से फिर बहलाने लगे ।
लोकतंत्र के भाग्य तो देखो मित्रो ,
संसद में गुंडे नजर अब आने लगे ।
सियासत का खेल भी बड़ा निराला ,
अब दुश्मन भी हाथ मिलाने लगे ।
"जय कुमार" 17/03/14
No comments:
Post a Comment