Saturday, 29 March 2014

एक ईमान कि कविता

मैंने कुछ नेताओं के बीच
एक ईमान कि कविता सुनाई
कविता कि वाह वाही हुई
उन्होंने मेरी पींठ थपथपाई
देखकर ऐसे लगा कि वह
वाह वाही के वहाने ठुंसे मार रहे है
सहवासी के रूप में गालियां देकर
अपना गुस्सा निकाल रहे है
एक नेता जी ने मुझे
आराम से बाजु में बुलाया
बुलाकर के फिर उन्होंने
मेरेको मीठा  मस्का लगाया
नम्रता से बोले आपका
बहुत नाम सुना है हमने
आप बहुत अच्छी कवितायें लिखते है
आपके नाम का हल्ला चारो ओर है
सख्सियत से आप ईमानदार दिखते है
मै तो आपका कायल हूँ
ईमानदारी के पथ पर  हूँ
बोले रिशवत से तो तौबा तौबा
कोसो दूर रहे घोटाले
जनता का सेवक हूँ प्यारे
जनता चाहे जब हमें बुलाले
मेरा काम है जनता कि सेवा
सेवा करता जाँऊगा
आज नहीं तो कल
पी एम का पद भी पाऊँगा  
नेता जी धीरे धीरे अपनी बात आने लगे
मुझे अपना दुखड़ा सुनाने लगे
बोले आजकल मेरी राजनीति के
सभी ग्रह उलटे चल रहे है
मेरी पार्टी नहीं है सत्ता में
और सी बी आई के छापे पड़ रहे है
पांच घोटालो और तीन चार
अपहरणों के मामलो में फँसा हूँ
ऊपर से सी बी आई के छापे
बड़ी टेन्सन में पड़ा हूँ
जनता में मेरी छवि बिगड़ती जा रही है
चुनाव सर पर है चिंता खाए जा रही है
मैंने कहा आप बात को रेलगाड़ी की तरह
लम्बी मत खींचिए
जुबान कि जंजीर को जल्दी से खींचिए
आप मुझसे क्या कहना चाहते है
साफ साफ तरीके से बोलिए
वक्त बर्बाद करने से अच्छा
आप  अपना मुख खोलिए
नेता जी मुश्कराये और बोले
आप एक  कविता लिखे जो
जनता को मोहित करने वाली हो
मेरी डगमगाती नैया को
पार लगाने वाली हो
जो मेरी तरफ लहर पैंदा कर दे
मेरी छवि को
ईमानदारी छवि में बदल दे
लोगो के दिलों में
मेरे समर्थन का जोश भर दे
कोई सुने तो ऐंसा लगे कि
गीता कि गंगा बह रही है
सुनाने वाला ऐंसा लगे कि
कृष्णा के मुख से वाणी खिर रही है
बोले मेरे दफ्तर में
कविता लिखके दे जाना
मेरे सेकेटरी से
जितने का चाहो चैक ले जाना
बोले जब हम एम पी बन जांयेगे
हम और अप दोनों दबा के खांएगे
मुझे बहुत तेज गुस्सा आया
पर क्या करू नेताजी थे
में कुछ नहीं कह पाया
फिर भी  मैंने कहा 
मेरी कवितांए बिकाऊ नहीं है
बोले में जनता हूँ कि 
तुमरी कवितांए बिकाऊ नहीं है
यदि खरीदना होता तो
इतनी प्रस्तावना ना डालता
ईमानदार हो इसलिए
इतना समय बर्बाद किया
नहीं तो माल निकलता
और कविता को जेब में डालता
इतना कह नेता जी चले गये
नेता जी तो चले गये
और हम खड़े रह गये
फिर मै  सोचने लगा
इस देश में ईमानदार लोग
कुछ तो करते है
भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर पाते तो क्या
भ्रष्टाचारियों का
समय तो बर्बाद करते है
इसी प्रकार हमने भी
नेता जी का समय बर्बाद किया
संतोष था जितने समय मेरे साथ रहा
कम से  कम उसके 
शैतानी दिमाग का प्रयोग न हुआ
अब आप सोचेंगे कि आपने अपना लेख
नेताजी को दिया या नहीं दिया
अरे मित्रों मैंने तो अब नेताओं के बीच
कविता सुनाना ही बंद कर दिया

"जय कुमार " १९ /०८ /२००४




 

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