Friday, 7 March 2014

अब तो बस वासनाओं

कदमों की आहट से जो पहचान लिया करते थे ,
वो अब सामने आकर भी अनजान बनते है । ।

बेईमान चादर की छाँव मेँ जिते रहे जो लोग ,
अब वो सब इस जमाने के ईमान बनते है ।

रब की तरह पूजते रहे हम जिनको सदियोँ ,
हमारे आँसुओं को देख वो अब बेजान बनते है ।

ख्वाब में भी कभी खुशी ना मिली हो जिनसे ,
वो ही मेरी जिंदगी के अब अरमान बनते है ।

ख्वाब टूट गया अब , टूट गयी वो कसमेँ ,
जिन वादो से रब के , इम्तिहान बनते है ।

वो जमाना ओर था जब मुहब्बत होती थी ,
अब तो बस वासनाओं के फरमान बनते है ।

"जय कुमार" 28/02/2014

No comments:

Post a Comment