Friday, 28 March 2014

चंद लम्हों

चंद लम्हों की चाँदनी थी वो ।
चंद अल्फाजो की चमक थी वो ।

बसंत की खूबसूरती उसमे ,
साँवन की सजी घटाये थी वो ।

गीष्म की गर्मी समाई उसमें ,
शरद की शीतलता थी वो ।

ख्याल किसको रहा रिवाजो का ,
मदमस्त मगरुर जवानी थी वो ।

हाथ में किसी के कुछ ना रहा ,
वक्त की वर्वर कहानी थी वो ।

टूट गई ठोकर खाकर आज जो ,
जह्न की जर्जर निशानी थी वो ।

जश्न मनाते रहे आशमान मेँ ,
जमीँ जीवन की कहानी थी वो ।

"जय कुमार"  27/03/2014

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