Friday, 7 March 2014

मैं अकेला निडर घूमता हूँ

मैं अकेला निडर घूमता हूँ तेरे शहर में ।
जीने का सहारा ढूँड लेता हूँ तेरे कहर में ।

वक्त की मार है या मेरा कल सामने आया ,
टूटता जा रहा हूँ अब मैं हरेक पहर में ।

दिन बीत गये फिर बो बीत गयीं बो बातेँ ,
अब बस मुहब्बत नजर आती तेरे जहर में ।

कौन कहता है तेरा असर फीका पड़ गया ,
कई दीवाने भटकते है अब भी शहर मेँ ।

कमजोर पड़ गया मेरा दिल फिर एक बार ,
जब तूने मेरे नाम को उछाल दिया बाजार मेँ ।

लौटकर आ ना आ अब यह तेरी मर्जी ,
मेरी तो जिँदगी गुजर जायेगी गजल में ।

"जय कुमार" 20/02/2014

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