Saturday, 12 September 2015

मेरी उम्मीद

मेरी उम्मीद से ज्यादा ,, निकलते गये ।
दर्द , चोट जख्म बन  नासूर बनते गये ।
मिटाता रहा खुदको गम मिटाने के लिए ,
नासाज हम हुए गम और सम्बलते गये ।।
"जय कुमार"24/07/15

No comments:

Post a Comment